जब स्वर्ग में दुर्योधन को देख हैरान रह गए भीम

महाभारत का युद्ध इतना भीषण था कि माना जाता है आज भी कुरुक्षेत्र की धरती का रंग लाल है। चचेरे भाइयों के बीच लड़े गए इस युद्ध का परिणाम क्या हुआ ये तो सभी जानते हैं।

लेकिन आज हम आपको बताएंगे कि युद्ध समाप्ति के बाद जब कौरव और पांडवों की जब पहली बार मुलाकात होती है तो उस समय क्या होता है।

अब आप सोच रहे होंगे कि युद्ध के दौरान ही सभी कौरव मृत्यु को प्राप्त हो गए थे तो फिर वे जीवित बचे पांडव भाइयों से कैसे मिल पाए?

महाभारत के युद्ध को समाप्त हुए कई वर्ष बाद, पांडवों को अपने चचेरे भाइयों और अन्य सगे-संबंधियों की याद सताने लगती हैं।

वे अपना सारा राजपाठ अपने उत्तरधिकारी परीक्षित को देकर स्वर्ग की यात्रा के लिए प्रस्थान कर लेते हैं।

स्वर्ग पहुंचने से पहले ही द्रौपदी समेत चार पांडवों की मृत्यु हो जाती है और एकमात्र युद्धिष्ठिर ही बचते हैं जिन्हें जीवित अवस्था में स्वर्ग पहुंचने का अवसर प्राप्त होता है।

युद्धिष्ठिर ने वहां पहुंचकर स्वर्ग और नर्क, दोनों को देखा। जैसे ही उन्होंने स्वर्ग में प्रवेश किया उनका सबसे पहले दुर्योधन से सामना हुआ। फिर एक-एक कर सभी भाइयों और द्रौपदी से भी उनकी मुलाकात हुई।

दुर्योधन को देखते ही भीम असमंजस में पड़ गए कि जिस दुर्योधन ने ईर्ष्या, द्वेष और लालच की वजह से अपने संबंधियों के साथ धोखा किया, रक्त बहाया, उसकी आत्मा को स्वर्ग में प्रवेश भी कैसे मिला।

भीम ने अपने भ्राता युद्धिष्ठिर से प्रश्न किया “जो व्यक्ति आजीवन बुरी नीयत के साथ कार्य करता है, अनीति का ही साथ देता है, उसे स्वर्ग की प्राप्ति कैसे हुई? यहां अवश्य ईश्वरीय न्याय में चूक हुई है।“

भीम का प्रश्न सुनकर युद्धिष्ठिर मुस्कुरने लगे। उन्होंने भीम से कहा कि ईश्वरीय न्याय में कभी चूक नहीं होती, बुरे व्यक्ति को उसकी बुराई का परिणाम और अच्छे व्यक्ति को उसके सुकर्मों का परिणाम अवश्य मिलता है।

युद्धिष्ठिर ने कहा कि हजारों बुराइयां होने के बाद भी दुर्योधन के भीतर एक अच्छाई थी और इसी अच्छाई ने उसे स्वर्ग दिलवाया।

भीम की जिज्ञासा शांत करते हुए धर्मराज युद्धिष्ठिर ने बताया कि अपने पूरे जीवन में दुर्योधन का ध्येय एक दम स्पष्ट था।

उसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने हर संभव कार्य किया। दुर्योधन को बचपन से ही सही संस्कार प्राप्त नहीं हुए इसलिए वह सच का साथ नहीं दे पाया।

लेकिन मार्ग में चाहे कितनी ही बाधएं क्यों ना आई हों, दुर्योधन का अपने उद्देश्य पर कायम रहना, दृढ़संकल्पित रहना ही उसकी अच्छाई साबित हुई।

युद्धिष्ठिर ने बताया कि अपने उद्देश्य के लिए एकनिष्ठ रहना मनुष्य का एक बड़ा सद्गुण है। इसी सद्गुण के कारण कुछ समय के लिए उसकी आत्मा को स्वर्ग के सुख भोगने का अवसर प्राप्त हुआ है। चूंकि युधिष्टिर अच्छा इंसान नहीं था इसलिए स्वर्ग का सुख उसे मात्र कुछ समय के लिए ही मिला

युद्धिष्ठिर की बात सुनकर भीम की जिज्ञासा शांत हुई और कुछ समय दुर्योधन और पांडवों ने फिर एक साथ बिताया।

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