जानिये: बिहार चुनाव में और अमेरिका में फेसबुक पर आपकी निजी जानकारियों को कैसे बनाया गया राजनीतिक हथियार

फेसबुक जिसपे आप रोज खाने से लेकर नहाने और आने जाने की बाते शेयर करते है उससे एक कंपनी ने सारी जानकारी निकाल ली है ! अब आप कहोगे मेरे पास ऐसा क्या है जो कोई ले जायेगा या फिर मेरे बारे में जानकारी लेकर कोई क्या कर लेगा तो हम आपको बताये सीधे शब्दों में जब आप कोई न्यूज़ देखते हो उसे पसंद करते हो नहीं करते हो आपका कुछ उस पर प्रतिक्रिया होती है ये सब बातें जानकार कंपनी उन लोगो के बारे में रिसर्च करती है फिर उसे कैसे बहकावे में लाना है उसके ऊपर सोध करती है !

पूरी फसड़ क्या हुई यहाँ पढ़ लो …दावा किया जा रहा है कि फेसबुक पर करीब 5 करोड़ यूजर्स की निजी जानकारियां लीक हुईं जिसका फायदा अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप के लिए काम कर रही फर्म कैम्ब्रिज एनालिटिका ने उठाया। आरोप हैं कि फर्म ने वोटर्स की राय को मैनिप्युलेट करने के लिए फेसबुक यूजर्स डेटा में सेंध लगाई। अब इस मामले में फेसबुक के संस्थापक जकरबर्ग से जवाब तलब किया गया है।

भारत से भी है कैम्ब्रिज एनालिटिका का कनेक्शन

ट्रंप का चुनावी कैंपेन संभाल चुकी कैंम्ब्रिज एनालिटिका का भारत के चुनावों के साथ भी कनेक्शन है। इसकी वेबसाइट पर जानकारी दी गई है कि 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में इसे कॉन्ट्रैक्ट मिला था और कुल टारगेट सीटों में से 90 फीसदी से अधिक पर इसके क्लाइंट को भारी जीत हुई थी। अब इस बात के भी चर्चे हैं कि यह फर्म भारत में 2019 के आम चुनावों के लिए भी राजनीतिक दलों के संपर्क में है।

यानी केवल अमेरिका ही नहीं, भारत समेत पूरी दुनिया के चुनाव इस नई तरह के बिग डेटा ऐनालिसिस से प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। 2016 में अमेरिकी चुनाव में डॉनल्ड ट्रंप की अप्रत्याशित जीत का श्रेय कैम्ब्रिज एनालिटिका को भी दिया गया। गार्जियन और न्यू यॉर्क टाइम्स के जॉइंट एक्सपोज में इस फर्म के संस्थापक क्रिस्टोफर वाइली ने इसके काम करने के तरीकों का खुलासा किया था।

वाइली ने 2014 में ही इस कंपनी को छोड़ दिया था। वाइली ने खुलासा किया कि कैसे कानूनी ने 5 करोड़ फेसबुक यूजर्स की निजी जानकारियों को अवैध तरीके से हासिल उनकी पसंद-नापसंद के आधार पर वोटर बेस को मैनिप्युलेट करने का काम किया। इस रिपोर्ट ने अपने यूजर्स के डेटा को सुरक्षित रखने के लिए प्रति फेसबुक की नाकामी को भी उजागर किया। फेसबुक के फाउंडर जकरबर्ग को इस मामले में ब्रिटेन की संसदीय समिति के सामने पेश होने का फरमान मिला है।

जानिए, कौन है कैम्ब्रिज एनालिटिका के पीछे
पिछले वर्षों में राजनीतिक दलों के बीच सोशल मीडिया पर सशक्त पकड़ की होड़ मची हुई है। सोशल मीडिया की बढ़ती पहुंच को देखते हुए बड़ी कंपनियां और सरकारों का बिग डेटा की तरफ रुझान तेजी से बढ़ा। दक्षिणपंथी वेबसाइट Breitbart के संस्थापक स्टीव बैनन ने इसे एक मौके के रूप में लिया। स्टीव ने क्रिस्टोफर वाइली में डेटा को हथियार बनाने क्षमता देखी और साथ मिलकर ब्रिटेन में कैम्ब्रिज एनालिटिका की नींव रखी। कंजरवेटिव हेजफंड के अरबपति रॉबर्ट मर्सर ने इस पूरी प्लैनिंग के लिए फंड जुटाया।

कैम्ब्रिज एनालिटिका ने कुछ इस तरह किया खेल
स्टीव बेनन के इस फर्म के लिए क्रिस्टोफर वाइली की ऐनालिसिस टेक्नीक का तबतक कोई इस्तेमाल नहीं था जबतक उनके पास इसपर काम करने के लिए बड़े पैमाने पर डेटा न हो। इस डेटा को हासिल करने के लिए फर्म ने सबसे पहले कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के साइकोमिट्रिक्स सेंटर से संपर्क साधा, लेकिन यहां दाल नहीं गली। सेंटर ने एथकिल ग्राउंड के आधार पर डेटा देने से इनकार कर दिया। दरअसल स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के साइकोमिट्रिक्स सेंटर ने एक स्टडी की थी। बैनन ऐंड कंपनी को इसी स्टडी का डेटा चाहिए था। न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक यह स्टडी ‘मायपर्सनैलिटी’ myPersonality नाम के एक फेसबुक ऐप से निकाले गए डेटा पर आधारित थी।

इस ऐप में साइकोमिट्रिक सेंटर की तरफ से 100 सवालों पर आधारित एक क्विज तैयार किया गया था। फेसबुक पर इस क्विज में शामिल होने वाले काफी यूजर्स ने इस ऐप को उनके फेसबुक प्रोफाइल डेटा और फ्रेंड लिस्ट डेटा तक पहुंच की इजाजत दे दी। इसकी मदद से शोधकर्ताओं को क्विज के जवाबों और यूजर्स प्रोफाइल के लाइक-डिसलाइक के क्रॉस परीक्षण की सहूलियत मिल गई। इससे एक ऐसा मॉडल तैयार हुआ जिससे शोधकर्ता यूजर्स की ऐक्टिविटी की मदद से उसके बारे में सटीक आकलन करने में सक्षम हो गए।

बैनन ऐंड कंपनी को अब इसी डेटा की तलाश थी। ऐसे में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के एक शोधकर्ता अलेक्जेंडर कोगन का साथ मिला। हालांकि कोगन के साथी ने वाइली का ऑफर ठुकरा दिया लेकिन कोगन ऐसा नहीं कर सके। कोगन ने कैम्ब्रिज एनालिटिका के लिए ‘दिसइजयोरडिजिटललाइफ’ (thisisyourdigitallife) नाम का फेसबुक ऐप बनाया। यह मायपर्सनैलिटी ऐप के क्विज ही जैसी थी। कोगन के क्विज ने 5 करोड़ से अधिक फेसबुक प्रोफाइल से डेटा निकालने का काम किया। इनमें से करीब 2 लाख 70 हजार लोगों ने कोगन के ऐप को उनकी जानकारियां लेने की अनुमति दी। ऐप की तरह से लोगों को यह बताया गया कि उनकी जानकारियां केवल अकादमिक रिसर्च के लिए इस्तेमाल की जाएंगी।

बिग डेटा के अलावा प्रॉपेगैंडा, फेक न्यूज, हनी ट्रैप का भी सहारा
वाइली के मुताबिक जबतक वह फर्म का हिस्सा थे तबतक कैम्ब्रिज एनालिटिका ने डेटा को खरीदने के लिए 7 मिलियन डॉलर खर्च किए थे। इसमें से एक मिलियन डॉलर की रकम कोगन की ग्लोबाइल साइंस रिसर्च को गई थी जिससे 5 करोड़ फेसबुक यूजर्स की निजी जानकारियां खरीदी गईं थीं। बिग डेटा को हासिल करने की इस कवायद के इतर फर्म ने दूसरे गलत रास्ते भी अपनाए। ब्रिटेन के चैनल 4 एक स्टिंग ऑपरेशन में कैमरे के सामने पकड़े गए फर्म के सीईओ अलेक्जेंडर निक्स समेत फर्म के दूसरे टॉप एग्जिक्यूटिव ने दूसरे तरीकों के बारे में भी जानकारी दी।

इस स्टिंग के फुटेज में निक्स और फर्म के मैनेजिंग डायरेक्टर मार्क को यह बताते हुए देखा गया कि चुनावों को प्रभावित करने के लिए कैसे प्रॉपेगैंडा, फेक न्यूज, हनी ट्रैप में फंसाने जैसे कृत्यों का भी सहारा लिया गया। हालांकि बाद में निक्स ने यूके की संसदीय समिति के सामने ऐसे किसी कृत्य को अंजाम देने से इनकार किया। फिलहाल कैम्ब्रिज एनालिटिका ने बिग डेटा सेंधमारी की इस खबर के सार्वजनिक होने के बाद निक्स को सस्पेंड कर दिया है।

फेसबुक ने भी होने दी यह चोरी
5 करोड़ यूजर्स के निजी डेटा की इस चोरी में फेसबुक की भूमिका को भी संदेह के दायरे में ला दिया है। आरोप लग रहे हैं कि फेसबुक ने इस चोरी को होने दिया। बिग डेटा चोरी की यह घटना 2015 में हुई लेकिन फेसबुक ने इस मामले में चुप्पी अब तोड़ी जब पिछले हफ्ते कई जगहों पर इसका खुलासा हुआ। अब फेसबुक ने जाकर माना है कि डेटा में सेंधमारी हुई। अब भी फेसबुक यूजर्स पर ही जिम्मेदारी डालता दिख रहा है। फेसबुक के वीपी और डेप्युटी जनरल काउंसल पॉल ग्रेवल ने अपने ब्लॉग में लिखा कि कोगन ने उन यूजर्स की जानकारी ली जिन्होंने ऐप में साइनअप किया और उन्हें अपनी मंजूरी दी।

आगे इस ब्लॉग पोस्ट में केवल इतना ही बताया गया है कि केवल 2 लाख 70 हजार यूजर्स ने ही कोगन के ऐप को डाउनलोड किया। फेसबुक के वीपी ने इस तथ्य की अनदेखी की कि ऐप ने इन यूजर्स के फेसबुक फ्रेंड्स के डेटा भी जुटाए। अपने साथियों को भेजे गए एक ईमेल में कोगन ने कथित तौर पर यह भी जानकारी दी है कि उसने कैम्ब्रिज एनालिटिका को करीब 3 करोड़ यूजर्स की जानकारी दी है। टेक्नॉलजी कंपनियां अक्सर अपने यूजर्स के बीच डेटा चोरी की खबरें सार्वजनिक करती रहती हैं लेकिन 2 सालों के दौरान फेसबुक ने एक बार भी अपनी यह जिम्मेदारी नहीं समझी।

ट्रंप के चुनावों में फेसबुक के जरिए रूसी हस्तक्षेप का भी मामला सामने आया था। इस संदर्भ में भी जब यूएस कांग्रेस में अपने जवाब में फेसबुक ने पूरी जानकारी देने की बजाय केवल इतना कहा कि केवल एक करोड़ लोगों ने रूसी लिंक वाले विज्ञापनों को देखा। अमेरिकी कांग्रेस में कुछ सुनवाइयों के बाद फेसबुक ने बाद में माना कि 10 करोड़ 26 लाख यूजर्स ने ऐसे विज्ञापन देखे। अब बिग डेटा लीक की इस खबर के सार्वजनिक हो जाने के बाद फेसबुक को तगड़ा झटका लगा है।

अमेरिकी और यूरोपीय सांसदों ने फेसबुक इंक से जवाब मांगा है। इसके बाद अमेरिका की सोशल मीडिया कंपनी के शेयर सोमवार को 7% टूट गए। शेयर की कीमत घटने की वजह से फेसबुक सीईओ मार्क जकरबर्क को एक दिन में 6.06 अरब डॉलर (करीब 395 अरब रुपये) का झटका लग गया। अमेरिका और यूरोप के सांसदों ने जकरबर्ग को उनके सामने पेश होने के लिए कहा है। आज जकरबर्ग की पेशी है और सांसद जानना चाहते हैं कि ब्रिटेन की कैम्ब्रिज एनालिटिका ने डॉनल्ड ट्रंप को अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव जीतने में किस तरह से मदद की?

ब्रायन ये व्हाट्स ऐप में काम करते है जिसको फेसबुक ने ख़रीदा हुआ है वो कह रहे अब हमें फेसबुक डिलीट कर देना चाहिए

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